गुरबख्श सिंह ढिल्लों (Gurbaksh Singh Dhillon) आज़ाद हिन्द फ़ौज के अधिकारी थे। इन्हें सिंगापुर में युद्धबंदी बना लिया गया था। इसके बाद में ब्रिटिश सेना ने उन पर कोर्ट मार्शल की कार्यवाई की थी। उन्हे 1998 में भारत सरकार द्वारा ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया गया।

आज़ाद हिन्द फ़ौज. जिसकी कमान भारत की आज़ादी के नायक रहे सुभाषचंद्र बोस के हाथों में थी. शुरुआत में इस फौज़ में उन भारतीय सैनिकों को भर्ती किया गया था, जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बनाए गए थे. बाद में इसका विस्तार हुआ. भारत की स्वतंत्रता में INA की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी.

यूं तो इस फ़ौज का हर एक सैनिक अपने आप में ख़ास था. मगर एक नाम ऐसा भी था, जिसने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए. ब्रिटिश सम्राट के खिलाफ युद्ध करने को लेकर इस योद्धा पर ना सिर्फ़ ‘लाल किला ट्रायल’ नामक ऐतिहासिक मुकादमा चलाया गया, बल्कि प्रताड़ित भी किया गया. मगर वह टूटा नहीं और आजादी के लाखों परवानों को एकता के एक सूत्र में बांध दिया.

यह कहानी है आज़ाद हिन्द फ़ौज में अधिकारी रहे कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों की, जिन्हें साल 1998 में भारत सरकार ने उनकी देशभक्ति के लिए ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया था.

कौन थे आज़ाद हिन्द फ़ौज के कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों
18 मार्च 1914. यह वह तारीख है, जब गुरबक्श सिंह ढिल्लों ने अपनी आंखें खोलीं. आम बच्चों की तरह वह बड़े हुए और शुरुआती पढ़ाई के लिए पास के सरकारी प्राथमिक विद्यालय गए. वहां से निकलने के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई का सफ़र जारी रखा और ग्रेजुएशन की डिग्री ली. शिक्षा ग्रहण करने की इस राह में सबसे खास रहा उनका अलग-अलग धर्मों के संस्थानों में दाखिला लेना. इसका असर उनके व्यक्तित्व पर भी पड़ा और वो एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति बनकर उभरे. वो हिन्दी के अलावा फारसी, अंग्रेजी, उर्दू जैसी कई अन्य भाषाएं बोल लेते थे.

शुरुआत में ढिल्लों को स्पष्ट नहीं था कि उन्हें आगे क्या करना है. उनका पूरा ध्यान बस ज्यादा से ज्यादा पढ़ने पर था. इसी बीच एक दिन उनसे किसी ने कहा, ढिल्लों तुम सेना में भर्ती क्यों नहीं हो जाते. तुम्हारा शरीर अच्छा हैं. तुम पढ़ने में भी तेज हो. तुम्हारा चयन आसानी से हो सकता है.

14वीं पंजाब रेजिमेंट का हिस्सा बने

ढिल्लों के दिमाग में ये बात घर कर गई और उन्होंने सेना में भर्ती होने की तैयारी शुरू कर दी. वह अब तय कर चुके थे कि वो भारतीय सेना का हिस्सा बनेंगे. उन्हें इसमें सफलता भी मिली. साल 1936 के आसपास भारतीय सेना से उनका बुलावा आया. इस तरह अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के बाद वो 14 वीं पंजाब रेजिमेंट की प्रथम बटालियन का हिस्सा बनाए गए.

यही वो पल था, जहां से ढिल्लों की जिंदगी पूरी तरह से बदल गई. नौकरी के दौरान अपनी कार्यशैली से ढिल्लों ने अपने सीनियर्स को प्रभावित किया. परिणाम स्वरूप वो द्वितीय विश्वयुद्ध का हिस्सा बनाए गए. इस जंग में उन्होंने विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब दिया था.

हालांकि, अंत में वो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे. बाद में 1942 में भारत को स्वतन्त्र कराने के लिए आजाद हिन्द फौज का संगठन हुआ तो ढिल्लो, कर्नल प्रेम सहगल, और मेजर जनरल शाह नवाज ख़ान समेत अन्य योद्धाओं के साथ इसके अभिन्न अंग बन गए और अंग्रेजों को खूब छकाया.

‘लाल किला ट्रायल’ नामक ऐतिहासिक मुकादमा
परिणाम स्वरूप युद्ध समाप्त होने के बाद अंग्रेज सरकार ने मुकद्दमा चलाया. साथ ही उन्हें दोषी ठहराते हुए कोर्ट-मार्शल के बाद सजा भी सुनाई. ‘लाल किला ट्रायल’ के नाम से ढिल्लों पर चलाया गया यह मुकदमा भारत की आजादी की राह आसान करने में मील का एक पत्थर बना.

इस ऐतिहासिक मुकदमे के दौरान लोगों के बीच एक नारा गूंजा ‘लाल किले से आई आवाज-सहगल, ढिल्लों, शहनवाज’. जिसने भारत की आजादी के लिए लड़ रहे नौजवानों के बीच ऊर्चा का संचार किया और उन्हें एकता के एक सूत्र में बांधा. लोगों ने ढिल्लों की सजा के विरोध में जगह-जगह गिरफ्तारी दी और अंग्रेजों की नाक में दम कर दिया.

कुल मिलाकर यह मुकदमा हर मोर्चों पर हिन्दुस्तानी एकता को मजबूत करने वाला साबित हुआ. अब तक अंग्रेज समझ चुके थे कि अगर इनको सजा दी गई तो भारतीय फौज में बगावत हो जाएगी. यही कारण रहा कि उन्हें सहगल, ढिल्लों और शाहनवाज समेत आजाद हिन्द फौज के सैकड़ों सैनिकों को ना सिर्फ़ रिहा करना पड़ा, बल्कि उनके मुकदमे भी खत्म करने पड़े.
आगे अंग्रेजों के खिलाफ भारतीय जलसेना ने भी विद्रोह कर दिया, जिसका खामियाजा अंग्रजों को भुगतना पड़ा. इन छोटी-छोटी कड़ियों से अंग्रेजों के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया और अंतत: उन्हें भारत छोड़कर जाना पड़ा. आजादी के सालों बाद तक ढिल्लों जीवित रहे. 6 फ़रवरी 2006 को अंतत: आज़ाद हिन्द फौज के इस योद्धा ने मृत्यु को गले लगा लिया था. उनकी जीवन पर एक फ़िल्म भी बनाई गई, जिसे ‘रागदेश’ के नाम से जाना जाता है.

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