सलूंबर की रानी हाड़ी रानी की यह कहानी 16वीं शताब्दी की है. तब किशनगढ़ के राजा मान सिंह थे और तब औरंगजेब ने किशनगढ़ पर आक्रमण करने के लिए कूच किया था. मेवाड़ के राजा राजसिंह ने औरंगजेब को किशनगढ़ से पहले रोकने की जिम्मेदारी सलूंबर के राव रतन सिंह को सौंपी थी।

राव रतन सिंह की शादी इससके एक दिन पहले ही हाड़ी रानी के साथ हुई थी. रानी के हाथों की मेहंदी भी नहीं सूखी थी कि राव रतन सिंह को युद्ध के मैदान में जाना था. राव हाड़ी रानी से इतना प्रेम करते थे की एक पल भी दूर रहना गंवारा नहीं था।

सलूंबर महल के चौक में खड़े होकर वे अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार कर रहे थे. लेकिन मन रानी को लेकर उदास था और तभी एक सैनिक से उन्होंने रानी की निशानी लाने को कहा. जब सैनिक रानी के पास निशानी लेने पहुंचा तो रानी को लगा कि राव रतन सिंह उनके प्रेम मोह से छूट नहीं पा रहे,ऐसे में हाड़ी रानी अपने हाथ से ही अपना शीश काट सैनिक से साथ भिजवा दिया. अपने प्यार में दिग्भ्रमित हुए पति का जोश बरकरार रखने और कर्तव्य याद दिलाते हुए हाड़ी रानी इस बलिदान के साथ हमेशा के लिए अमर हो गईं.

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