Bhima Koregaon Violence: भीमा कोरेगांव की लड़ाई 1 जनवरी 1818 को कोरेगांव भीमा में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और पेशवा सेना के बीच लड़ी गई थी.
भीमा-कोरेगांव की बरसी पर भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर वहां रैली करना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी है. चंद्रशेखर को भीमा-कोरेगांव स्मारक स्थल पर पहुंचने से पहले ही रोक ले लिया गया है.
1 जनवरी 2018 को महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांवमें हिंसा भड़की थी, जिसे पेशवाओं के नेतृत्व वाले मराठा साम्राज्य और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुए युद्ध के लिए जाना जाता है. कहानी 205 साल पहले 1818 में हुए एक युद्ध से जुड़ी है. मराठा सेना यह युद्ध अंग्रेजों से हार गई थी. दावा किया जाता है कि ईस्ट इंडिया कंपनी को महार रेजीमेंट के सैनिकों की बहादुरी की वजह से यह जीत हासिल हुई थी. ऐसे में यह जगह पेशवाओं पर महारों यानी अनुसूचित जातियों की जीत के एक स्मारक के तौर पर स्थापित हो गई.

साल 1 जनवरी 2018 को पुणे से करीब 40 किमी दूर भीमा-कोरेगांव में अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों का एक कार्यक्रम आयोजित हुआ था, जिसका कुछ दक्षिणपंथी संगठनों ने विरोध किया. इसके बाद हिंसा भड़क गई थी. आइए जानते हैं कि आखिर यहां हर साल एक जनवरी में अनुसूचित जाति के लोग क्यों इकट्ठा होते हैं?
भीमा-कोरेगांव महाराष्ट्र के पुणे जिले में है. इस गांव से मराठा का इतिहास जुड़ा है. 205 साल पहले यानी 1 जनवरी, 1818 को ईस्ट इंडिया कपंनी की सेना ने पेशवा की बड़ी सेना को कोरेगांव में हरा दिया था. पेशवा सेना का नेतृत्व बाजीराव-द्वितीय कर रहे थे.
बाद में इस लड़ाई को अनुसूचित जातियों के इतिहास में एक खास जगह मिल गई. बीआर आंबेडकर का समर्थन करने वाले अनुसूचित जाति के लोग इस लड़ाई को राष्ट्रवाद बनाम साम्राज्यवाद की लड़ाई नहीं कहते हैं. अनुसूचित जाति के लोग इस लड़ाई में अपनी जीत मानते हैं. उनके मुताबिक इस लड़ाई में अनुसूचित जातियों के खिलाफ अत्याचार करने वाले पेशवा की हार हुई थी.

अनुसूचित जाति के चिंतक व मेरठ यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सतीश प्रकाश के मुताबिक ‘भीमा-कोरेगांव की लड़ाई में अंग्रेजों की ओर से लड़ने वाले ज्यादातर सैनिक महाराष्ट्र की अनुसूचित जाति (महार जाति) से ताल्लुक रखते थे. महार शिवाजी के समय से ही मराठा सेना का हिस्सा रहे थे, लेकिन बाजीराव द्वितीय ने अपनी ब्राह्मणवादी सोच की वजह से उनको सेना में भर्ती करने से इनकार कर दिया था.’
इस जीत की वजह से ही हर साल जब 1 जनवरी को दुनिया भर में नए साल का जश्न मनाया जाता है उस वक्त अनुसूचित जाति समुदाय के लोग भीमा-कोरेगांव में जमा होते है. वो यहां ‘विजय स्तम्भ’ के सामने अपना सम्मान प्रकट करते हैं. ये विजय स्तम्भ ईस्ट इंडिया कंपनी ने उस युद्ध में शामिल होने वाले लोगों की याद में बनाया था. इस स्तम्भ पर 1818 के युद्ध में शामिल होने वाले महार योद्धाओं के नाम अंकित हैं. वो योद्धा जिन्हें पेशवा के खिलाफ जीत मिली थी.
भीमा-कोरेगांव की बरसी पर भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर वहां रैली करना चाहते थे, लेकिन प्रशासन ने उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी है. चंद्रशेखर को भीमा-कोरेगांव स्मारक स्थल पर पहुंचने से पहले ही रोक ले लिया गया है.
डॉ. सतीश प्रकाश के मुताबिक, ‘भीमा-कोरेगांव अनुसूचित जातियों के सामाजिक आंदोलन के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे उन्हें पता चलता है कि वे भी कभी योद्धा थे. क्योंकि उनकी इस पहचान को लगभग मिटा दिया गया है. अनुसूचित जातियों का मूवमेंट इस वक्त दो तरह से चल रहा है. पहले वह जिसमें यह माना जाता है कि कुछ ऊंची जातियां उनके कष्टों का कारण हैं.
दूसरा वह जिसे अनुसूचित जाति का युवा फॉलो कर रहा है. जिसमें वे भीमा कोरेगांव जैसे अपने शौर्य के प्रतीकों के साथ आगे बढ़ रहे हैं. जिसमें वो चमार रेजीमेंट को बहाल करने की मांग करते हैं. जिसमें वे पारंपरिक शैली से इतर आक्रामक और अपने गौरवशाली इतिहास के सहारे अपनी लाइन को बड़ी करने में जुटे हुए हैं.’
