आज कोरोना से पूरा देश परेशान है, बहुत सारे लोगो की नौकरी चली गई है कोरोना की वजह से, परन्तु सबसे ज्यादा परेशानी उनलोगों को हुई जो रोज कमाने खाने वाले लोग है। उनके पास ना तो खाने के पैसे थे ना वापस घर जाने के। परन्तु इस समस्या के घड़ी में हमारे सरकार ने और बहुत सारे लोगो मजदूरों की मदद की। आइए जानते है उन्ही में से कुछ लोगो के बारे में।

बाबा करनैल सिंह का परिचय-
बाबा करनैल सिंह मुम्बई की यवतमाल के NH- 7 के पास रहते है, उनकी आयु 81 वर्ष की है। जब पहली बार पिछले साल लॉक डाउन हुआ था तो उन्होंने उनलोगों के लिए लंगर का इंतजाम किया था जो अपने घर से दूर फसे हुए थे, अब जब कोरोना को दूसरी लहर आयी है तब फिर से बाबा जी सक्रिय हो गए है लोगो की मदद करने के लिए। उन्होंने 15 सिलेंडर के साथ एक ऑक्सीजन बैंक शुरू किया है और कोरोना पीड़ितों को मुफ्त में ऑक्सीजन प्रदान कर रहे हैं।

हमेशा से करते आए है सबकी मदद-
जहाँ पर बाबा जी का लंगर चलता है वो आदिवासी छेत्र है, उसके पास आपको 150 कोलोमीटर से 300 किलोमीटर तक खाने का कोई भी ढाबा नही मिलेगा। बाबाजी 33 साल से “गुरु का लंगर” खिला रहे है, ऐसा कभी नही हुआ है कि कोई भी मुसाफिर इधर से बिना लंगर खाये चला गया हो। अब तक 30 लाख से अधिक लोग उनके लंगर में खाने का लुत्फ उठा चुके है।

न्यूज़ रिपोर्टर से बात करते हुए बाबा जी कहते है कि लॉक डाउन के समय रोजाना बहुत सारे लोग आते थे, उन्होंने सबका मुस्कुरा कर स्वागत किया बिना किसी की जाती, धर्म या कुछ भी जाने, लंगर खिलाने के लिए सेवक और सेविकाओं ने भी काफी मेहनत की बाबाजी कहते हैं। बाबाजी की 17 लोगो की टीम है जिसमे 11 रसोइए है बाकी लोग सब्जी काटने से लेकर खाना परोसने का काम करते है।

भाई ने की आर्थिक रूप से मदद-
अब जाहिर सी बात है की इतने लोगो का खाना मुफ्त में तो आएगा नही परन्तु बाबाजी के भाई नई जर्सी यूएस में रहते है, उन्होंने ही बाबाजी की मदद की आर्थिक रूप ताकि वो लोगो को खाना खिलाने जैसा पुण्य का काम कर सके। बाबाजी के लंगर में आपको ब्रेड, बिस्कुट और चाय का नास्ता मिलेगा, उसके बाद खाने में दाल, आलू की सब्जी, रोटी-चावल आदि परोसे जाते है।

जिस डिस्पोजल प्लेट में बाबाजी लोगो को खाने खिलाते है उसके आधार पर उन्होंने न्यूज़ रिपोर्टरों को ये बताया है कि लॉक डाउन के शुरुआती 10 हफ़्तों में उन्होंने 15 लाख से अधिक लोगो को लंगर में खाना खिलाया है। उनके लंगर से पशुओं का भी पेट भरता है। बाबाजी मूल रूप से यूपी के मेरठ के रहने वाले है, परन्तु जब वो मात्र 11 साल के थे तब उन्होंने अपना घर छोड़ दिया था और समाज सेवा करने में लग गए।

बाबा जी का काम सराहनीय है और प्रेरणा लेने लायक है, हम उन्हें ढ़ेर सारी शुभकामनाएं देते है।

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