हिन्दू-राष्ट्र के गौरव क्षत्रपति शिवाजी महाराज को एक महान और शक्तिशाली योद्धा किसने बनाया? वो कौन था, जिसके शब्दों के सम्मान के लिए शिवाजी ने सिंहगढ़ के किले को जीतने के लिए अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया। स्वराज के लिए लड़ने वाले शिवाजी को आज भी कई लोग पूजते हैं। उनके पराक्रम के किस्से सुनाए जाते हैं। लेकिन उस औरत पर बात बहुत ही कम होती है, जिसने शिवाजी को असल में छत्रपति शिवाजी महाराज बनाया।

हम बात कर रहे हैं जीजाबाई की, जो शिवाजी की मां थीं। इन्हें राजमाता जिजाऊ भी कहा जाता है। माँ जीजाबाई के प्रति उनकी श्रद्धा ओर आज्ञाकारिता उन्हे एक आदर्श सुपुत्र सिद्ध करती है। शिवाजी का व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि उनसे मिलने वाला हर व्यक्ति उनसे प्रभावित हो जाता था।

शिवाजी को छत्रपति बनाने वाली माता जीजाबाई

हिन्दू-राष्ट्र के गौरव क्षत्रपति शिवाजी की माता जीजाबाई का जन्म सन् 1597 ई. में सिन्दखेड़ के अधिपति जाघवराव के यहां हुआ। जीजाबाई बाल्यकाल से ही हिन्दुत्व प्रेमी, धार्मिक तथा साहसी स्वभाव की थीं। काफी छोटी ही थीं कि उनकी शादी करवा दी गई। शाहजी भोसले नाम के एक चर्चित योद्धा के साथ। भोसले वंश से आते थे।

शुरुआत में इन दोनों परिवारों में दोस्ती हुई, लेकिन बाद में यह दोस्ती कड़वाहट में बदल गई; क्योंकि जीजाबाई के पिता मुगलों के पक्षधर थे। जीजाबाई ने 10 अप्रैल 1627 को शिवनेर के किले में शिवाजी को जन्म दिया। लेकिन शाहजी को युद्ध कार्य के लिए जाना पड़ा। वह अपनी पत्नी और नवजात बेटे को पुणे के शिवनेरी किले में छोड़कर काम पर चला गया।

अपने पति की उपेक्षा के कारण जीजाबाई ने अनेक असहनीय कष्ट सहकर शिशु शिव का पालन-पोषण किया। यहाँ शिवाजी को पालने की जिम्मेदारी जीजाबाई पर आ पड़ी। उसने शिवाजी को वह सब कुछ सिखाया जो वह जानती थी। रामायण, महाभारत और स्वयं वीर पुरुषों की गौरवशाली गाथाओं को सुनाकर शिवाजी के मन को हिंदू आध्यात्मिकता से सम्मानित किया।

जिस दौरान शिवाजी की जन्म हुआ, उस दौरान मराठा समुदाय मिलिट्री कम्युनिटी के तौर पर भी ट्रांसफॉर्म हो रहा था। ऐसे में जीजाबाई मिलिट्री के नज़रिए से भी शिवाजी को विकसित कर रही थीं। वह प्राय: कहा करती- ‘यदि तुम संसार में आदर्श हिन्दू बनकर रहना चाहते हो स्वराज की स्थापना करो। देश से यवनों और विधर्मियों को निकालकर हिन्दू-धर्म की रक्षा करो।’

जीजाबाई का स्वराज शिवाजी ने बनाया

शिवाजी ने स्वराज के कॉन्सेप्ट पर काम किया। उन्होंने किले जीतने शुरू किए, और जब 1674 में उनका राजतिलक हुआ और वो छत्रपति शिवाजी महाराज बने। शिवाजी ने जीजाबाई के स्वराज के कॉन्सेप्ट पर काम करते हुए छोटे-बड़े करीब 248 किले जीते थे।

इतिहासकार बताते हैं कि शिवाजी जिस भी किले को जीतने जाते, मां का आशीर्वाद ज़रूर लेते थे, और उनकी परमिशन से ही जाते थे। इतिहासकार ये भी मानते हैं कि शिवाजी ने जो राज्य बनाया, वो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मां की प्रेरणा से ही बना।

शिवाजी महाराज ने सिंहगढ़ का किला जीत लिया

शिवाजी और उनका मां जीजाबाई का एक किस्सा ख़ासा मशहूर है। जिसका जिक्र, ‘भारत की गरिमामयी नारियां’ नामक किताब में मिलता है। किस्सा कुछ ऐसा है कि जब भी जीजाबाई सिंहगढ़ के किले पर मुगलों के झंडे को देखती थीं, तब उनका कलेजा दु:ख से भर जाता था।

एक दिन उन्होंने शिवाजी को अपने पास बुलाया और कहा, “बेटा शिवा! तुमने किसी भी कीमत पर सिंहगढ़ जीतना है। वह यहीं नहीं रुकी, उन्होंने शिवाजी के अंदर जोश भरते हुए कहा, बेटा अगर तुमने इसके ऊपर लहराते हुए विदेशी झंड़े को उतार कर नहीं फेंका दिया, तो कुछ भी नहीं किया। मैं तुम्हें उसी समय अपना पुत्र समझूंगी, जब तुम ऐसा करने में सफल होगे।”

यह बक्त ऐसा था जब शिवाजी इतने परिपक्व नहीं थे। वंही मुग़लों की सेना की ताकत बहुत विशाल थी। ऐसे में माँ का आदेश सुन शिवाजी ने बड़ी विनम्रता से माँ को उत्तर दिया और कहा:-

“माता! मुग़लों की सेना हमारी तुलना में बहुत विशाल है। हमारी मौजूदा स्थिति भी उनकी तुलना में कमज़ोर है। ऐसे में उनसे युद्ध करना और सिंहगढ़ से उनका झंडा उतारना आसान नहीं होगा। यह एक कठिन लक्ष्य है।”

शिवाजी का यह जवाब जीजाबाई के गले से नहीं उतरा। वो आवेश में आ गईं और गुस्से में कहा:-

”धिक्कार है तुम्हे बेटा शिव! तुम्हें ख़ुद मेरा बेटा कहना छोड़ देना चाहिए। तुम चूड़ियां पहनकर घर में बैठो। मैं स्वयं फ़ौज के साथ सिंहगढ़ के दुर्ग पर आक्रमण करूंगी और विदेशी झंडे को उस पर से उतार कर फेंक दूंगी।”

मां की बातें सुनकर शिवाजी लज्जित हो गए। उन्होंने सबसे पहले अपनी मां से क्षमा मांगी। और दूसरे ही पल माँ को सिंहगढ़ किला जीतने का बचन दिया। अगले ही पल उन्होंने तानाजी को बुलवाया और जंग की तैयारी करने के लिए कहा। ताना जी ने शिवाजी के आदेश का पालन किया और सैनिको संग सिंहगढ़ किला पर चढ़ाई सुरु कर दी।

योजनाबद्ध तरीके से सैनिकों के साथ क़िले के नीचे इकट्ठे हुए। लेकिन सिंहगढ़ किला जीतना बच्चो का खेल नहीं था। और किले को भेदना तो विल्कुल नामुमकिन सा प्रतीत होता था। लेकिन तानाजी ने हार नहीं मानी, ऐसे में तानाजी ने सूझ-बूझ से काम लिया और चार-पांच सैनिकों के साथ अपनी किले की दीवार पर चढ़ना शुरू कर दिया।

अंत में, बाह अपने सहयोगियों के साथ सिंहगढ़ किले पर चढ़ने में कामयाब रहे, दोनों सेनाओं के बीच युद्ध हुआ और इस भयंकर युद्ध में तानाजी शहीद हो गए। लेकिन तब तक तानाजी सिंहगढ़ दुर्ग पर भगवा लहरा चुके थे, मतलब तानाजी ने मरते ही सिंहगढ़ दुर्ग पर विजय प्राप्त कर ली थी।

जब यह खबर शिवाजी तक पहुंची तो उनकी आंखें नम हो गईं। इस जीत के बाद उनके मुंह से बस इतना ही निकला, ‘गढ़ आला, पान सिंह गेला’ यानी किला तो जीत लिया लेकिन शेर हार गया। आखिर जीजाबाई की साधना सफल हुई। शिवाजी ने महाराष्ट्र सहित भारत के अधिकांश भाग पर स्वराज का स्वतंत्र ध्वज फहराया। मां जीजाबाई के प्रति उनकी भक्ति और आज्ञाकारिता उन्हें एक आदर्श पुत्र साबित करती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *