आंवला, सेब और बेल का मुरब्बा (Murabba) लोग बड़े ही चाव से खाते हैं. इसे खाने के स्वास्थ्य लाभ भी हैं. सर्दियों में आंवले का तो गर्मियों में बेल का मुरब्बा सेहत के लिए फ़ायदेमंद साबित होता है. गुजरात में आम का मुरब्बा और यूपी में आंवले के मुरब्बे को चाहने वालों की कोई कमी नहीं है. मुरब्बा चाहे किसी भी फल का या सब्ज़ी का हो ये खाने में बहुत ही स्वादिष्ट होता है.

मगर जिस मुरब्बे को आप हर सीज़न में चटकारे मारकर खाते हैं, उसका इतिहास क्या है और वो पहली बार कहां बनाया गया था जानते हैं आप? आज हम आपको मुरब्बे के इतिहास से जुड़ी हर कहानी बताएंगे.

मुरब्बे की उत्पत्ति
मुरब्बे का इतिहास इसकी वैरायटी की तरह ही अलग-अलग है. इसकी उत्पत्ति की कहानियां भी ढेरों हैं. कुछ लोग कहते हैं कि मुरब्बे को पहली बार फ़ारस में बना जिसकी एक वजह भारत भी है. दरअसल, भारत में सहस्राब्दी पहले गन्ने से चीनी बनाना शुरू हुआ. यहां से चीनी फ़ारस पहुंची. इसे वहां के लोग औषधी के रूप में इस्तेमाल करने लगे. इन्होंने इससे जैम बनाना शुरू किया, जो कुछ-कुछ मुरब्बे जैसा ही होता है.

बाद में अरब के लोगों तक फारस से चीनी पहुंची. अरबों ने इसमें कुछ मसाले और जड़ी बूटियां मिलाकर फलों को कुछ दिनों तक रखने लगे. वो इन्हें बीमारियों से बचने के लिए खाते थे. ‘मुरब्बा’ शब्द भी अरबी मूल का है. 10 वीं शताब्दी की एक बुक में इसे बनाने की रेसिपी लिखी है जिसे ‘मुरब्बायत’ नाम दिया गया है. इसमें अदरक, खजूर, कटे हुए खीरे, नींबू आदि से बने मुरब्बे की रेसिपी लिखी हैं.

एक और कहानी जो बाबर और इब्राहिम लोधी के युद्ध से जुड़ी है. इसके अनुसार, जब लाहौर के गवर्नर दौलत ख़ान लोधी ने बाबर को दिल्ली के बादशाह से युद्ध करने का निमंत्रण भेजा था तो उसने उस पैगाम के साथ आम का मुरब्बा भी भिजवाया था. ये अधपक्के आम थे जिन्हें शहद में संरक्षित कर मुरब्बा बनाया गया था. बाबर को ये अंदाज़ बहुत ही पसंद आया था.

भारत कैसे पहुंचा मुरब्बा

बात करें भारत की तो हमारे देश में मुरब्बा सेंट्रल एशिया से आया था. हालांकि, बाबर वाले क़िस्से से पता चलता है कि भारत में मुग़लों के आगमन से पहले ही मुरब्बा बनाने की तकनीक थी. एक और कहानी कहती है कि ये भारत में गुर्जिस्तान यानी जॉर्जिया से आए खानाबदोश जनजातियों की देन है.
वहीं कुछ लोगों का मानना है कि पहली बार मुरब्बे को पुर्तगालियों ने बनाया था. खाद्य इतिहासकार Michael Krondl के अनुसार पुर्तगाली फलों को चीनी में संरक्षित करने में माहिर थे. फ़्रांसिसी इतिहासकार Francis Bernier ने 17वीं शताब्दी में अपनी बंगाल की यात्रा के दौरान इसके बारे में लिखा था.

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