पूरे भारत के हर कोने में यहां वहां हज़ारों मंदिर मौजूद हैं। लेकिन यह मंदिर अपने आप में अनौखा है।उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खेरी ज़िले के ओयल क़स्बे में स्थित मंडूक मंदिर या मेंढ़क मंदिर एक अलग तरह का मंदिर है। पूरा मंदिर कुछ इस तरह से बनाया गया है कि जैसे मंदिर मेंढ़क की पीठ पर सवारी कर रहा हो।

इस मंदिर की कहानी दरअसल राजा बख़्त सिंह के ज़माने की है। राजा बख़्त सिंह 19वीं शताब्दी में ओयल के ज़मींदार थे। कोई पुरुष उनका उत्तराधिकारी नहीं था। इसलिए उनके दिल में बेटा पाने की तड़प थी। एक तांत्रिक साधू ने उन्हें शिव मंदिर बनवाने की सलाह दी। लेकिन उससे पहले, तांत्रिक परम्परा के अनुसार उनसे एक मेंड़क की बलि चढ़ाने के लिए कहा गया क्योंकि मेढ़क प्रजनन शक्ति का प्रतीक माना जाता है।मंदिर उसी जगह पर बनावाया गया जहां मेंढ़क की बलि दी गई थी। इसीलिए मंदिर को इसी तरह बनाया गया है ताकि ऐसा लगे कि एक बहुत बड़ा मेंढ़क मंदिर को अपनी पीठ पर उठाय हुए है।

भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का गर्भगृह भी तांत्रिक-यंत्र के आकार का बनवाया गया है।गुप्त तांत्रिक की सुझाई गई वास्तु-कला के आधार पर ही इसे बनवाया गया था।

गर्भगृह सौ फ़ुट ऊंचा बनाया गया है। वहां सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ता है। ऐसा कहा जाता है कि गर्भगृह अष्ट कोणीय कमल पर बनाया गया है।उसकी बाहरी दीवार पर तांत्रिक और हिंदू देवी-दावताओं की मूर्तियां चित्रित हैं।जबकि अंदरूनी दीवीर पर वनस्पति से बने अनेक रंगों से बने चित्र हैं। शिव और शक्ति की उकेरी गई आकृतियां सबसे ऊपर हैं।।

मंदिर में तांत्रिक अनुष्ठान बहुत पहले बंद हो चुके हैं। लेकिन मेंढ़क मंदिर आज भी उतना ही चर्चित है। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि मंदिर के दर्शन से ख़ुशहाली बढ़ती है। औलाद पाने की इच्छा में शादीशुदा जोड़े भी यहां आशीर्वाद लेने आते हैं। क्योंकि मेढ़क भाग्य और प्रजनन शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

मेंड़क मंदिर अपनी अनौखी डिज़ाइन की वजह से पूरे भारत में अपनी लग हैसियत का मालिक है।

मेंढ़क मंदिर, उत्तरप्रदेश के, लखीमपुर खेरी ज़िले के ओयल क़स्बे में है। सबसे क़रीब, लखीमपुर खेरी रेल्वे स्टेशन है जो यहां से सिर्फ़ 14 किलोमीटर दूर है। लखनऊ का अमौसी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा ओयल से 135 किलोमीटर दूर है।

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